Friday, February 13, 2015

                                                    शिकायतों की शिकायत 

शिकायत अपने आप में एक ऐसा शब्द है जिसे लिखते ही जहन में ना जाने कितने ख्याल आ जाते है, कुछ ऐसे वाक्य जो कभी कभी खुद पे गुस्सा दिलाते है,जहाँ खुद को बेबस और असहाय पाते हुए कुछ न कर सकने की मजबूरी बेचैनियाँ बढ़ने वाली होती है तो कभी इस समाज और इसकी बनाई हुई परम्परा को हिकारत भरी नज़रों से देखने की तरफ प्रेरित करती है | कहाँ कहाँ तक , किस किस की , किस किस से शिकायत करूँ ,ये अपने आप में एक अनुतारित प्रश्न बन कर मेरे सामने खड़ा हो जाता है , जिसके जवाब आज तक नहीं मिले |


                                                            आज की भागती हुई जिंदगी में कोई ऐसा नहीं है जिसको किसी से शिकायत नहीं है, और मैं भला कहाँ की तीस मार खां हूँ, जो किसीसे शिकायत न हो | जैसे आज के आधुनिक युग में हर चीज़ अपने प्रकार में बंटी है , वैसे ही शिकायत के भी कई प्रकार - किसी को खुद से शिकायत तो किसी को किसी और से |


                                                         हाँ मुझे भी शिकायत है .................
मुझे शिकायत है उन लगों से जो अपने खामियों को उतनी तीजी से ढकते है , जितनी ही तेजी से अपनी तारीफ़ सुनने को अपने कान पसारे रहते है | एक तरफ जिधर देखो उधर हाहाकार मची है अच्छा और सच्चा समाज बनाने की, लेकिन क्या कोई बताएगा कि ऐसे लोगों के रहते समाज में कोई विकास  हो सकता है , जो सिर्फ अपनी तारीफ के पुल बाधे बैठे है | चलिए आप सब ने ये कहावत तो सुनी ही होगी "सच हमेशा कड़वा होता है "
दरअसल इस कहावत को वही लोग ज्यादा इस्तेमाल करते है जो सिर्फ अपनी तारीफ़ सुनना पसंद करते है लेकिन जिस दिन , समाज के नागरिक अपनी गलतियों को स्वीकारना शुरू कर दें उस दिन शायद "सच हमेशा कड़वा होता है "  जैसी कहावत इस समाज से कहीं छूमंतर हो जाएगी|

             
                                                                मोटे तौर पर देखा जाए तो अपनी ड्यूटी हर कोई कर रहा है चाहे वो पुलिस वाला हो , चाय वाला हो , ट्रैफिक वाला हो या देश का बड़ा से से बड़ा नेता ही क्यों न हो ......! लेकिन सोचने वाली बात ये है की क्या कोई वाकई में अपनी ड्यूटी निभा रहा है ?

                                                                 
                                                                    समाज और देश में बढती हुई इस बेमानी को देख कर तो अब खुद पर भी शक होने लगा है कि , शायद मैं खुद भी इमानदार बस इसलिए तो नहीं कि मुझे बईमानी का मौका नहीं मिला ? और मौका मिलते है मैं भी इन बईमानों की कतार में शामिल हो जाऊं , इससे ज्यादा दुखद स्थिति भला और क्या हो सकती है ?