Monday, April 20, 2015

अगर तुम ना होते

अगर तुम ना होते 

सासों का थमना और एक मेरे मासूम दिल का धडकना क्या वैसा ही होता 
अगर तुम न होते....

किसी के बारे में सोच बस झूम उठना हर वक़्त अपने इबादतों में उसे ही पाना
क्या ये ख्याल उतने ही रूहाने होते 
अगर तुम न होते.... 

क्या वो पहली बारिश में भीगना आज भी उतनी ही सौंधी होता 
अगर तुम न होते.... 

मेरा दिल तो ना जाने कबसे तनहा था 
क्या इसमें कुछ कुछ होने वाला एहसास पनप पता 
अगर तुम न होते....

हजारों की भीड़ में इन पलकों का बड़ी ही नजाकत से सिर्फ तेरी तरफ उठाना 
क्या ये गुस्ताखी बस यूँ ही हो जाती
अगर तुम ना होते.... 

धड़कते दिल से बेताबियाँ चुरा 
झट से मेरी आँखों में सात रंगों के ख्वाब भर देना
क्या ये तजुर्बा उतना ही रंगीन होता 
अगर तुम ना होते... 

बस अब तो ये कहना बाकी था 
की हमें और जीने की चाहत ना होती 
अगर तुम ना होते 
अगर तुम ना होते ...!!!!

" परिवर्तन ही जिंदगी है "

" परिवर्तन ही जिंदगी है "

कुछ बात है जो दिल तक आकर जुबान तक आती नहीं 
इतने सहमे हुए है की 
किसी और का ख्याल दिल में आता नही 
कभी बड़े होने को उतावले हुआ करते थे हम
लेकिन आज ये एहसास हुआ की आखिर क्यों इतने जल्दी बड़े हो गए हम ?

खावाहिसों के पीछे के पीछे यूँ भागना अब छोड़ दिया हमने 
अब तो मामला दिल का है, मुस्कुरा कर आगे बढ़ना भी सिख लिया हमने 
यूँ तो जिंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्तों से उलझने का मजा कुछ और है 
अपनी भागती हुई जिंदगी से कुछ वक़्त आप खुद को दो 

क्यों की खुद से सवाल जवाब करने का मजा ही कुछ और है 
अजनबियों की भीड़ में अपने आपको क्यों सामिल करना 
जबकि दिल में राजा बनने का मजा ही कुछ और है |

कह के भी कुछ कहा नही जाता ....
हँस के भी हंसा नहीं जाता .....
जो ख़ुशी थी हमसे कोसो दूर, उनसे दूर अब रहा नहीं जाता 
पल भर की ख़ुशी को कैद करना सिख लिया हमने 
जिन्दगी के सतरंगी लम्हे को दिल से जीना भी सीख लिया हमने 

बन के फितूर अक्सर क्यों बेवजह आगे बढ़ जाया करते थे हम 
जो करे थे वादे अक्सर उन्ही में उलझे खुद को पाते थे हम 
खुशियों की झोली जो हमसे निराश हो गई थी 
उनमे एक नई जान भी डाल दिया हमने 

जिन बातों से थी मैं अधूरी अब वो बातें भी पूरी लगती है 
कुछ अनकहे से रिश्ते भी अब कहे कहे से लगते है
किसी अहसास के आने से खोद में  भी खाश हो गए है हम 
कुछ भी कहना ज्यादा होगा, बस इतने से चुप कर लेते है उन्हें हम 

अब सोच के सोचूं भी क्या ? चाह के चाहूँ भी क्या ?
वो मंजिल अब मंजिल कहाँ ? पहुँच के भी पहुँच ना पाऊं वहां 
अब तो मंजिल को को पाने की चाह को भी पा लिया हमने 
तन्हाई में भी सच्चा साथी अब ढूंढ लिया हमने 

दिल विल अब हार चलूँ मैं , खुद में ही बेपरवाह चलूँ मैं 
जो चलूँ तो इस कदर चलूँ की अब बेजान रास्तों में भी जान डाल दूँ |


Wednesday, April 8, 2015

पहिया

   पहिया

पहिया, ये सूचक है रफ़्तार का , जीवन के गाडी को एक सही से पथ पे आगे बढाने का माध्यम है पहिया | इस एक सूचक के माध्यम से हम जाने कितने जीवन के पहलूओ पर विचार कर सकते है | पहिये से हमरा मतलब सिर्फ उसके घुमने और उसके रफ़्तार से नहीं है इसका मतलब जीवन को संतुलित करने से भी है, जैसे की पहिया ना तो अकेले कभी खड़ा हो सकता है और ना ही किसी की मदद से उसमे गति आ सकती है| ठीक वैसे ही जीवन के हर मोड़ पे हमारा कोई सच्चा पथ प्रदर्शक होना भी आवश्यक है, जो हमें सही दिशा का ज्ञान दे सके वो किसी भी रूप में हमें मिल सकता है जैसे – गुरु, मित्र, परिवार का कोई सदस्य या कोई भी | जरूरत है वो हमें समझे और सही सलाह दे सके |

                      मोटे तौर पे देखा जाए तो पहिया शब्द अपने आप में एक पहेली लिए बैठा है, और सही मायने में जिंदगी की रफ़्तार को एक सकारात्मक सोच के साथ वही आगे बढ़ा सकता है जो इसके पहेली की समझ जाए |

          पहिये की बनावट पर थोडा गौर करें तो इसकी इसकी तीलियाँ प्रतीक है जीवन के अलग साथ का जो हमें बांधे रहती है और मजबूत बनती है | जीवन के हर मोड़ पे जाने कितनी परेशानियाँ हमें लक्ष्य से विचलित कर सकती है लेकिन पहिये की धुरी हमने संभाले रहती और निरभर गति से अपने जीवन पथ पर अग्रसर करती है और लक्ष्य तक पहुंचाती है |

पहिया जीवन चक्र का प्रतीक बन कर हमें खुद को संतुलित करने का महत्व समझाती है |

       “ उलझने तो बिखरी पड़ी है यहाँ – वहां, उन्हें कभी सुलझाओ तो ...!!
        आपकी जिंदगी की पहिया बिलकुल अपने सही रफ़्तार में होगी ...
         बस थोड़े सयंम के साथ खुद में सकारात्मक सोच लाओ तो || ”  

Friday, February 13, 2015

                                                    शिकायतों की शिकायत 

शिकायत अपने आप में एक ऐसा शब्द है जिसे लिखते ही जहन में ना जाने कितने ख्याल आ जाते है, कुछ ऐसे वाक्य जो कभी कभी खुद पे गुस्सा दिलाते है,जहाँ खुद को बेबस और असहाय पाते हुए कुछ न कर सकने की मजबूरी बेचैनियाँ बढ़ने वाली होती है तो कभी इस समाज और इसकी बनाई हुई परम्परा को हिकारत भरी नज़रों से देखने की तरफ प्रेरित करती है | कहाँ कहाँ तक , किस किस की , किस किस से शिकायत करूँ ,ये अपने आप में एक अनुतारित प्रश्न बन कर मेरे सामने खड़ा हो जाता है , जिसके जवाब आज तक नहीं मिले |


                                                            आज की भागती हुई जिंदगी में कोई ऐसा नहीं है जिसको किसी से शिकायत नहीं है, और मैं भला कहाँ की तीस मार खां हूँ, जो किसीसे शिकायत न हो | जैसे आज के आधुनिक युग में हर चीज़ अपने प्रकार में बंटी है , वैसे ही शिकायत के भी कई प्रकार - किसी को खुद से शिकायत तो किसी को किसी और से |


                                                         हाँ मुझे भी शिकायत है .................
मुझे शिकायत है उन लगों से जो अपने खामियों को उतनी तीजी से ढकते है , जितनी ही तेजी से अपनी तारीफ़ सुनने को अपने कान पसारे रहते है | एक तरफ जिधर देखो उधर हाहाकार मची है अच्छा और सच्चा समाज बनाने की, लेकिन क्या कोई बताएगा कि ऐसे लोगों के रहते समाज में कोई विकास  हो सकता है , जो सिर्फ अपनी तारीफ के पुल बाधे बैठे है | चलिए आप सब ने ये कहावत तो सुनी ही होगी "सच हमेशा कड़वा होता है "
दरअसल इस कहावत को वही लोग ज्यादा इस्तेमाल करते है जो सिर्फ अपनी तारीफ़ सुनना पसंद करते है लेकिन जिस दिन , समाज के नागरिक अपनी गलतियों को स्वीकारना शुरू कर दें उस दिन शायद "सच हमेशा कड़वा होता है "  जैसी कहावत इस समाज से कहीं छूमंतर हो जाएगी|

             
                                                                मोटे तौर पर देखा जाए तो अपनी ड्यूटी हर कोई कर रहा है चाहे वो पुलिस वाला हो , चाय वाला हो , ट्रैफिक वाला हो या देश का बड़ा से से बड़ा नेता ही क्यों न हो ......! लेकिन सोचने वाली बात ये है की क्या कोई वाकई में अपनी ड्यूटी निभा रहा है ?

                                                                 
                                                                    समाज और देश में बढती हुई इस बेमानी को देख कर तो अब खुद पर भी शक होने लगा है कि , शायद मैं खुद भी इमानदार बस इसलिए तो नहीं कि मुझे बईमानी का मौका नहीं मिला ? और मौका मिलते है मैं भी इन बईमानों की कतार में शामिल हो जाऊं , इससे ज्यादा दुखद स्थिति भला और क्या हो सकती है ?