कह के भी कुछ कहा नही जाता ....
हँस के भी हंसा नहीं जाता .....
जो ख़ुशी थी हमसे कोसो दूर, उनसे दूर अब रहा नहीं जाता
पल भर की ख़ुशी को कैद करना सिख लिया हमने
जिन्दगी के सतरंगी लम्हे को दिल से जीना भी सीख लिया हमने
बन के फितूर अक्सर क्यों बेवजह आगे बढ़ जाया करते थे हम
जो करे थे वादे अक्सर उन्ही में उलझे खुद को पाते थे हम
खुशियों की झोली जो हमसे निराश हो गई थी
उनमे एक नई जान भी डाल दिया हमने
जिन बातों से थी मैं अधूरी अब वो बातें भी पूरी लगती है
कुछ अनकहे से रिश्ते भी अब कहे कहे से लगते है
किसी अहसास के आने से खोद में भी खाश हो गए है हम
कुछ भी कहना ज्यादा होगा, बस इतने से चुप कर लेते है उन्हें हम
अब सोच के सोचूं भी क्या ? चाह के चाहूँ भी क्या ?
वो मंजिल अब मंजिल कहाँ ? पहुँच के भी पहुँच ना पाऊं वहां
अब तो मंजिल को को पाने की चाह को भी पा लिया हमने
तन्हाई में भी सच्चा साथी अब ढूंढ लिया हमने
दिल विल अब हार चलूँ मैं , खुद में ही बेपरवाह चलूँ मैं
जो चलूँ तो इस कदर चलूँ की अब बेजान रास्तों में भी जान डाल दूँ |
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